Thursday, 15 May 2014

ग़रीबी नही ग़रीबो को मिटाओ |



कृपया आप न आप बनकर न पाठ करे... अपने आप को एक ग़रीब मजदूर के साँचे मे फिट करके देखिए.......

आज की हमारी राजनीति केवल सांकेतिक मूल्‍यो पर ही आधारित है| कभी कोई आटो वालो के सम्मेलन मे जाता है तो कोई किसी दलित के यहाँ खाना ख़ाता है,तो कोई मुस्लिमो के ब्यापार मंडल मे जाकर लंबी चौड़ी बाते फेकता है| ये सब बाते हमे क्या बताती है, ये हमे बताती है कि हमारे देश मे कितनी जागरूकता , शिक्षा की कमी है| मैं मानता हूँ कि हमे आज़ादी के अभी ६७ साल ही हुए है लेकिन ज़रा सोचिए क़ि अंग्रजो के शासन और आज की हमारे व्यवस्था मे क्या फ़र्क है? आप पाएँगे की कुछ तथाकथित उदाहरण को छोड़कर लगभग सारी व्यवस्था पुरानी जैसी ही है|कौन कहता है कि हम गुलाम थे,अगर हम तब गुलाम थे तो आज भी हम गुलाम ही हैं| अब आप पूछेंगे कैसे? मैं बताता हूँ............
१- उस समय हम पुलिस वालो से डरते थे,आज क्या हमे पुलिस वालो से डर नही लगता है? लगता है , मैने कोई बुरा काम नही किया है लेकिन डर लगता है , पता नही क्यो लगता है कि अगर पकड़ लेगा तो मारेगा भी और मेरे सारे पैसे छीन लेगा| ये सारी परिस्थितिया पहले भी थी| लोग कहते है कि पहले तो पुलिस किसी को भी तंग करती थी, नही पुलिस केवल उन्हे ही तंग करती थी जो की विद्रोही थे. उन्हे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता था.. वो व्यवस्था आज भी है , भले ही प्रताड़ना का हथियार क्यो न बदल गया हो..........
२-किसी भी अफ़सर से मिलना और अपनी बाते कहना एक बहुत बड़ी बात थी जो कि आज भी है| आज तो और भी मुश्किल है क्यो कि आज तो हाथ पैर जोड़ना पड़ता है फिर भी काम नही होता है| पहले ऐसा नही था रोने गिड़गिदाने से बड़ा से बड़ा काम बहुत ही आसानी से हो जाता था| आज तो वो हथियार भी ग़रीबो से छीन लिया गया|

सत्येंद्र पटेल

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