Sunday, 4 May 2014
विकसित भारत ???????
लगता है मेरा सपना एक ऐसे विकसित देश मे रहने का धरा का धरा रह जाएगा जहाँ कोई भी आदमी भूखा न हो, और उसके पास ब्यक्तिगत जीवन के सारे साजो- समान उपलब्ध हो | मुझे उसी तरह की निराशा हो रही है जैसे की कलाम साहब को हो रही होगी | लेकिन हो भी क्यो न यहाँ के लोग जो बदलने के लए तैयार नही है| जब भी मेरी बात मेरे घनिष्ठ मित्रो से होती है है तब मुझे लगता है जब मेरे साथ के लोग ही नही बदलना चाहते है तो मैं औरो की क्या बात करू , मेरे कुछ साथी कहते है कि मुझे आने वाले दीनो में जब भी मुझे मौका मिलेगा तो तुरंत मैं भ्रष्टाचार करके तुरंत मैं अपने जीवन को अच्छा और अपने आप को साहब बना लूँगा | लोग अपने अतीत को बहुत जल्दी भूल जाते है इसलिए मैं तो अपने इसी वर्तमान को ही मेरे जीवन के सबसे अच्छे दिन मानकर अपने जीवन को जीना चाहता हूँ| कोई भी अच्छा समाज वहॉ के एजुकेटेड लोगो के समझदारी पर निर्भर करता है,लेकिन भारत मे आज के लोग अपने परिवार के अलावा और किसी भी सामाजिक ज़िम्मेदारी से भाग जाना चाहते है, ये भी हो सकता है की वो लायक न हो| इतने बड़े देश को आगे बढ़ाने के लिए इच्छासकति की ज़रूरत होती है जो आज का अपना समाज पूरी तरह से खो चुका है|
अगर आप लोग ईमानदार रहेंगे तो हो सकता है कि इस देश का भला हो जाए यदि नही तो कोई बात नही, भगवान इस देश के ग़रीबो की रक्षा करे|
मैने सुना है कि इस देश मे पैसे से ही पैसा बनता है न की आपके अपने दिमाक के दम पर, यही इस देश की सबसे बड़ी परेशानी है| आप यहा पर अपना उद्योग नही चला सकते क्यो? क्योकि यहाँ पर हर आदमी इस भ्रष्टाचार रूपी बीमारी से ग्रस्त हो चुका है,इससे हमे निकलना होगा| आप दूसरे को मत देखिए प्लीज़ आप अपने आप से ही शुरूवात तो कीजिए|
हम बदलेंगे देश बदलेंगा|
हमारे यहा के कुटीर उद्योग बिल्कुल बंद हो चुके है जो चल भी रहे है वो इन मल्टी नॅशनल कंपनी के आगे टिक नही पा रही है| सोचिए कि हर इक विलेज मे दो या तीन कुटीर उद्योग हो तो फिर क्या कहना | हमारे माताए , बहने , दादा ,दादी दिन भर वहाँ काम करके अपने घर का पूरा खर्चा वहाँ कर लेते| इसीलिए मुझे पुराने जमाने क़ी अर्थव्यवस्था बहुत ही जमती है|आज सरकार की नीतियो ने तो ग़रीबो को बेसहारा बना दिया है वो केवल अपनी हड्डी गलाते है वो भी केवल अपना और बच्चो के पेट भरने के लिए| वही कोई सरकारी कर्मचारी दिन मे केवल दो घंटे के कुर्सी तोड़ने के लिए उसे इतना पैसा की वो कुल्लू-मनाली आसानी से घूम सके | वाह रे देश तेरा क्या कहना !!!!!!
अब आप शारीरिक और मानसिक श्रम वाला जुमला मत फेकना, मुझे ठीक तरह से मालूम है कि कौन कितना मानसिक श्रम करता है|
ईमानदार बने रहे ............ धन्यवाद
सत्येंद्र पटेल
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